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सहमें गण और तंत्र की बर्निंग टे्न
हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ और 26 जनवरी 195० को गणराज्य बना है। 26 जनवरी को हमारा संविधान लागू हुआ था। आजादी के पहले से ही भारत के नेता आजाद भारत की तस्वीर बनाने लगे थे। सुभाषचंद्र बोस कांगे्रस के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने नेहरूजी की अध्यक्षता में भारत के आर्थिक विकास की योजना बनाने का उत्तरदायित्व सौंप दिया। इसीलिए नेहरूजी ने आजादी प्राप्त होते ही 1948 में भारत की पहली औद्योगिक नीति घोषित कर दी। इसके फलस्वरूप 1 अप्रैल 1951 को पहली पंचवर्षीय योजना लागू कर दी गई। इस तरह हर पांच वर्ष बाद पहली, दूसरी और तीसरी आदि अन्य योजनाएं लागू होने लगीं।
भारत के विकास की इन योजनाओं के फलस्वरूप ही देश आजादी के कुछ पहले और बाद में जन्मी शिक्षित पीढ़ी उच्चवर्ग और मध्यम वर्ग के रूप में देश में स्थापित हुई। इन योजनाओं के फलस्वरूप कृषि, उद्योग, बैंक, बीमा, बिजली, शिक्षा, रेल्वे, आदि के क्षेत्र में करोड़ों लोगों को रोजगार मिलने लगा था। सरकार की नीतियों के फलस्वरूप स्कूलों, कॉलेजों, रेलवे, बांधों, नहरों, सड़कों, कारखानों, नये-नये दफ्तरों, नये-विभागों में लोगों को रोजगार मिलने लगा। खेती में बिजली और सिंचाई के कारण किसानों की हालत आजादी के पहले से अच्छी होने लगी। आजादी के बाद से देखते हैं कि सरकार की योजनाओं के कारण एक नये भारत का निर्माण होने लगा था। एक नये तरह का समाज बनने लगा था।
आज आजादी के 7० वर्षों बाद देश की स्थिति बिल्कुल उलटी हो गई है। आज सरकार ने देश के विकास का सारा काम निजी क्षेत्र को सौंप दिया है। सरकार केवल पुलिस, सेना जैसे क्षेत्रों में नौकरी दे रही है। सरकार मुक्त-बाजार के नाम पर गरीबों की आजीविका, पर्यावरण और आने वाली पीढिय़ों की कीमत पर निजी कंपनियों को लाभ उठाने दे रही हैं। सरकारी नौकरियां ही नहीं हैं। इस तरह आरक्षण की व्यवस्था का कोई अर्थ नहीं रह जाता। सरकारों ने समाज को उसी अवस्था में पहुंचा दिया जहां से आधुनिक भारत की यात्रा शुरू हुई थी। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी आदि क्षेत्रों के लिए समाज निजी क्षेत्र पर निर्भर हो गया है। समाज के गरीब, निम्न और मध्यमवर्ग के बच्चों को नौकरियां और व्यवसाय के अवसर नहीं मिल रहे हैं। इस कारण आरक्षण आंदोलन बढ़ता जा रहा है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं और शहरों में रोजगार नहीं है।
आजादी के पहले भारत से ब्रिटेन की जरूरतें पूरी होती थीं। आजकल वैश्वीकरण के बाद भारत अमेरिका और यूरोप के देशों की जरूरतें पूरी कर रहा है। हमारे चिकित्सा और इंजीनियरिंग के संस्थान अमेरिका और यूरोप के देशों के लिए डाक्टर और इंजीनियर पैदा कर रहे हैं। इसी तरह कृषि, खनिज और दूसरे क्षेत्रों में अमेरिका की नीतियों और जरूरतों को ध्यान में रखा जाता हैं।
असीम श्रीवास्तव और आशीष कोठारी की पुस्तक 'पृथ्वी मंथनÓ में कहा गया है कि वैश्वीकरण के बाद खुली अर्थव्यवस्था से भारत एक 'बर्निंग-टे्रनÓ बन गया है। इस टे्रन के कुछ डिब्बों में जिसमें आम आदमी और किसान बैठे हैं, में आग लगी हुई है। इस टे्रन में एसी कोच में बैठे लोग ये न समझें कि वे आराम से हैं। इस दौड़ती हुई बर्निंग-टे्रन के गरीबों के डिब्बों की आग न बुझाई गई तो एक दिन पूरी ट्रेन आग की लपटों में होगी। वातानुकूलित कूपों में बैठे लोग चाहते हैं टे्रन और दौड़ाई जाए। टे्रन के ड्राइवर (प्रधानमंत्री) को भी ट्रेन दौड़ाने का चस्का लग गया है। लोग विस्थापन, करजों, बेदखलियों, खेती में गिरावट और बेरोजगारी के कारण गरीबी की आग में जल रहे हैं। तीन लाख से अधिक किसानों ने तो इस गरीबी की आग से घबराकर आत्महत्या कर ली है। लेकिन कुछ लोग कह रहे हैं और तेज और तेज। अब तक तो बैंक भी जल जलकर ढहने गिरने लगे हैं। पर ड्राइवर याने प्रधानमंत्री कह रहा है-यह देखो स्पीड.....
यह कैसा गणतंत्र है जो अपने रईस गणों के लिए गरीबगणों की बलि चढ़ाता बढ़ रहा है। ड्राइवर चिल्ला रहा है देखो-देखो मेरी स्पीड...। 

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कुछ गलत रिपोर्टिंग होने पर भी मीडिया के विरुद्ध मानहानि केस नहीं-सुप्रीमकोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इसी 8 जनवरी को टिप्पणी की है कि प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पूरी होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम.खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ की खंडपीठ ने एक पत्रकार और मीडिया हाऊस के खिलाफ मानहानि की शिकायत निरस्त करने के पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए की है। पीठ ने कहा है कि याचिकाकर्ता को सहनशीलता सीखनी चाहिए। किसी कथित घोटाले की रिपोर्टिंग करते समय उत्साह में कुछ गलती हो सकती है परंतु हमें प्रेस को पूरी तरह से बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देनी चाहिए। कुछ गलत रिपोर्टिंग हो सकती है परंतु इसके लिए प्रेस को मानहानि के शिंकजे में नहीं घेरना चाहिए। अदालत ने मानहानि के बारे में दंडात्मक कानून को सही ठहराने संबंधी अपने पहले के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रावधान भले ही संविधानिक हो परंतु किसी घोटाले के बारे में कथित गलत रिपोर्टिंग मानहानि का अपराध नहीं बनती है।
इस मामले में एक महिला ने एक खबर की गलत रिपोर्टिंग प्रसारित करने के लिए एक पत्रकार के खिलाफ निजी मानहानि की शिकायत निरस्त करने के बिहार हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। महिला का कहना था कि गलत रिपोर्टिंग से उसकी और उसके परिवार के सदस्यों की बदनामी हुई है।
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का स्थानीय पत्रकारिता और राजनीति के क्षेत्र में विशेष महत्व है। पिछले दिनों सत्ताधारी समर्थकों द्वारा प्रेस के विरुद्ध धरना प्रदर्शन की एक नई प्रवृति शुरू हुई है। बड़े और महत्वपूर्ण पद के नेताओं के परिवार और समर्थकों द्वारा प्रेस के विरुद्ध प्रदर्शन की प्रवृति आम ही नहीं वरन् उत्तरदायित्व पूर्ण पेशों से जुड़े लोगों के लिए आदर्श बनने लगी है।
हमारे यहां कहा भी जाता है जिस मार्ग से भद्र जन जाते हंै, उसी मार्ग से आम लोग भी जाने लगते हैं। इसी कारण समाज के विशिष्टजनों का दायित्व हो जाता है कि वे उसी आचरण का पालन करें। जिसकी अपेक्षा वे अपने समाज से करते हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे स्वयं अपने पद की गरिमा खोने लगते हैं। ऐसा बहुत से बड़े सम्मानजनक माने जाने पेशों के साथ घटित हो चुका है। राजनीति की महिमा और भी निराली है। चुनावों के समय प्रेस पर आरोप लगाया जाता है कि उसने फलां नेता के फलां गैर कानूनी काम के बारे में नहीं लिखा है। अब जब प्रेस घोटालों के बारे में लिखता है तो उसके विरुद्ध धरना-प्रदर्शन, मानहानि तक किया जाता है। इस तरह माहौल में सुप्रीमकोर्ट का फैसला राजनीति के घटाटोप में फैले अंधेरे में सूर्य के प्रकाश की तरह आया है।