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कुछ गलत रिपोर्टिंग होने पर भी मीडिया के विरुद्ध मानहानि केस नहीं-सुप्रीमकोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इसी 8 जनवरी को टिप्पणी की है कि प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पूरी होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम.खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ की खंडपीठ ने एक पत्रकार और मीडिया हाऊस के खिलाफ मानहानि की शिकायत निरस्त करने के पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए की है। पीठ ने कहा है कि याचिकाकर्ता को सहनशीलता सीखनी चाहिए। किसी कथित घोटाले की रिपोर्टिंग करते समय उत्साह में कुछ गलती हो सकती है परंतु हमें प्रेस को पूरी तरह से बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देनी चाहिए। कुछ गलत रिपोर्टिंग हो सकती है परंतु इसके लिए प्रेस को मानहानि के शिंकजे में नहीं घेरना चाहिए। अदालत ने मानहानि के बारे में दंडात्मक कानून को सही ठहराने संबंधी अपने पहले के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रावधान भले ही संविधानिक हो परंतु किसी घोटाले के बारे में कथित गलत रिपोर्टिंग मानहानि का अपराध नहीं बनती है।
इस मामले में एक महिला ने एक खबर की गलत रिपोर्टिंग प्रसारित करने के लिए एक पत्रकार के खिलाफ निजी मानहानि की शिकायत निरस्त करने के बिहार हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। महिला का कहना था कि गलत रिपोर्टिंग से उसकी और उसके परिवार के सदस्यों की बदनामी हुई है।
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का स्थानीय पत्रकारिता और राजनीति के क्षेत्र में विशेष महत्व है। पिछले दिनों सत्ताधारी समर्थकों द्वारा प्रेस के विरुद्ध धरना प्रदर्शन की एक नई प्रवृति शुरू हुई है। बड़े और महत्वपूर्ण पद के नेताओं के परिवार और समर्थकों द्वारा प्रेस के विरुद्ध प्रदर्शन की प्रवृति आम ही नहीं वरन् उत्तरदायित्व पूर्ण पेशों से जुड़े लोगों के लिए आदर्श बनने लगी है।
हमारे यहां कहा भी जाता है जिस मार्ग से भद्र जन जाते हंै, उसी मार्ग से आम लोग भी जाने लगते हैं। इसी कारण समाज के विशिष्टजनों का दायित्व हो जाता है कि वे उसी आचरण का पालन करें। जिसकी अपेक्षा वे अपने समाज से करते हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे स्वयं अपने पद की गरिमा खोने लगते हैं। ऐसा बहुत से बड़े सम्मानजनक माने जाने पेशों के साथ घटित हो चुका है। राजनीति की महिमा और भी निराली है। चुनावों के समय प्रेस पर आरोप लगाया जाता है कि उसने फलां नेता के फलां गैर कानूनी काम के बारे में नहीं लिखा है। अब जब प्रेस घोटालों के बारे में लिखता है तो उसके विरुद्ध धरना-प्रदर्शन, मानहानि तक किया जाता है। इस तरह माहौल में सुप्रीमकोर्ट का फैसला राजनीति के घटाटोप में फैले अंधेरे में सूर्य के प्रकाश की तरह आया है।