Role of Narmada criminal politician and governance

  नर्मदा के अपराधी राजनेता और शासन-प्रशासन की भूमिका
होशंगाबाद के कमिश्रर ने पिछले दो माहों में शायद दसवीं बार चेतावनी दी है कि नर्मदा को हम देश की सबसे पवित्र नदी मानते हैं क्या हम उसे अपनी आंखों के सामने सूखते हुए देखेंगे?
होशंगाबाद के संभागायुक्त ने पुन: एक बार नर्मदा नदी के रिपेरियन जोन की समीक्षा बैठक में अपनी यह चिंता व्यक्त की हैं। कमिश्रर उमाकांत उमराव ने कहा कि इस वर्ष नर्मदा में मात्र 32 क्यूबेक पानी शेष बचा हैं। हंडिया में इस 31 मार्च की स्थिति में 2० क्यूबेक पानी ही है। नर्मदा नदी की सहायक नदियां विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतों से पानी लाकर नर्मदा में मिलती हैं। कमिश्रर की यह अपील है कि हम नर्मदा के सूखने के पहले कुछ करें?
कमिश्रर साहब की इस बात को सभी को गंभीरता से लेना चाहिए।  होशंगाबाद के कमिश्रर का ऐसा बार-बार कहना एक समर्पित अधिकारी की चिंताएं है। इसमें किसी को शंका नहीं है कि राजनीतिक स्तर के दबावों ने हमारी व्यूरोक्रेसी को लाचार बना दिया है। दो टूक कहें तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनके परिवार, उनके मित्र और उनके दल के विधायक और नेताओं ने नर्मदा को मृत्यु के द्वार पर लाकर खड़ा कर दिया है। नर्मदा ने नर्मदाघाटी की सबसे प्राचीन सभ्यता को जन्म दिया है। एक नदी के सूख जाने का आशय उसकी गोद में पल रही संस्कृति और सभ्यता का भी नष्ट हो जाना है। नर्मदा की सहायक छोटी-छोटी नदियों के सूखने से ही यह संकेत मिलने लगा था कि कुछ वर्षों बाद नर्मदा का सूखना शुरू होगा पर यह सब इतनी जल्दी होगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। अभी 29 अप्रैल को 'नर्मदा बचाओ आंदोलनÓ की नैत्री मेघा पाटकर ने इंदौर में एक बैठक की थी। इसमें मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों ने भाग लिया था। इसमें भी नर्मदा के सूखते जाने की गंभीर समस्या पर चिंता व्यक्त की गई हैं।
हमसे हमारा इतिहास यह पूछेगा कि नर्मदा जब सूख रही थी तब उसके किनारे का समाज क्या कर रहा था? नर्मदा को इस स्थिति तक पहुंचाने वाले राजनेताओं के नेतृत्व में आरती और महाआरती का होना यह बताता है कि वास्तव में महाआरती सत्ता-प्रतिष्ठानों से जुड़े नेताओंं की आरती है। नर्मदा का इस स्तर पर पहुंचा देने वाले राजनेताओं की सुरक्षा-व्यवस्था में शासन-प्रशासन तो चुस्त दिखता है पर वही शासन-प्रशासन नर्मदा की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए कुछ नहीं करता है। रिकार्ड के लिए कुछ प्रतीकात्मक कार्यवाही की जाती है। कितने आश्चर्य की बात है कि नर्मदा के शोषण से करोड़पति बन रहे राजनेताओं की सुरक्षा व्यवस्था में सारा पुलिस प्रशासन लगा रहता है। इससे समाज की ताकत कम हो जाती है। नर्मदा को इस दुरावस्था तक पहुंचाने के उत्तरदायी कुछ अन्य पहलू भी हैं। व्यूरोक्रेसी नेताओं के सामने सदा झुकी रहती हैं क्योंकि अधिकारियों के ट्रांसफर और प्रमोशन इन नेताओं की सहमती से ही होते हैं। इन भ्रष्ट नेताओं के विरुद्ध समाज को एकजुट हो सत्याग्रह करने की परम्परा भी इसलिए समाप्त होती जा रही है क्योंकि अधिकारीगण नेताओं के विरुद्ध प्रदर्शन और आंदोलन को बहुत कठोरता से कुचलने लगे हैं। काले झंडे दिखाने को भी अपराध मान लिया जाता है।  कोई बैठक, कोई सभा, कोई प्रदर्शन पुलिस की अनुमति के बिना संभव नहीं। इस कारण हमारा समाज भ्रष्ट राजनेताओं के विरुद्ध एकजुट नहीं हो पाता है। क्योंकि कानून के रक्षक अधिकारी, मंत्री, विधायक, सांसद और छोटे-छोटे नेताओं को संरक्षण देने में अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। इनके विरुद्ध प्रदर्शन को देशद्रोह जैसा बना दिया है। नर्मदा नदी अब बहने वाली नदी न रहकर दो बांधों के बीच एक तालाब बनकर रह गई है। नर्मदा के ये तालाब बरसात के पानी से तो भर जायेंगे परंतु पुन: आगामी मार्च-अप्रैल तक पुन: सूख जायेंगे। आम लोगों के पास अब अंत में एक ही अधिकार बचा है कि इस बार के चुनाव में आम लोग नर्मदा के अपराधियों को उनकी प्राप्त सत्ता से बेदखल कर दें। यह कहा जा सकता है कि नर्मदा के अपराधियों को सत्ता-बदर करना ही मां नर्मदा के प्रति सच्ची भक्ति है। इस तरह की भावना ब्यूरोक्रेसी में भी आनी चाहिए कि इन अपराधियों को उनके इरादों को पूरा करने से रोका जा सके। आम लोग चुप-चाप अधिकारियों और राजनेताओं के आपसी मेल-मिलाप को देख रहे हैं। इस संबंध में विश्व बांध आयोग की रिपोर्ट कहती है कि ''सरकारी गोपनीयता कानून सरकारी क्रियाकलापों पर गोपनीयता का पर्दा डाल देता है और लोगों को इन क्रियाकलापों से दूर रखने का काम करता है। यह लोगों को न सिर्फ जानकारी से वंचित करता है बल्कि संबंधित क्षेत्र में पहुंचने से भी वंचित कर देता है। और 'भागीदारीपूर्णÓ या 'जन-केन्द्रितÓ नियोजन को निरर्थक बना देता है।ÓÓ अभी भी समय है हमारे नेताओं को इस ओर गंभीरता से ध्यान देकर कार्यवाही कराना चाहिए।