सुप्रीमकोर्ट ने विवादग्रस्त जमीन के प्रकरण में नगरपालिका इटारसी को यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया
सुधार न्यास द्वारा अधिकृत की गई जमीन का न तो आवार्ड पारित हुआ न जमीन स्वामी को मुआवजा मिला और जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई
इटारसी। सुप्रीमकोर्ट ने एडव्होकेट दीपक जैन की एक याचिका को स्वीकार करते हुए विवादग्रस्त जमीन के प्रकरण में नगरपालिका को यथास्थिति बनाये रखने का आदेश जारी किया है। प्रकरण का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है कि इटारसी में 1981 में सुधार न्यास की स्थापना की गई थी। न्यास ने आवासीय कालोनी बनाने के लिए 55 एकड़ जमीन अधिकृत करना प्रस्तावित किया था। फेज-1 में आ रही जमीन को न्यास ने अधिकृत करने की पूर्ण प्रक्रिया की थी परंतु फेज-2 में एडव्होकेट अरविंद जैन सहित उनके परिजनों की लगभग साढ़े 5 एकड़ जमीन थी उसे वर्ष 1983 में भूखंड मालिक अरविंद जैन एडव्होकेट ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
यह जमीन अधिग्रहण की कार्यवाही होती इसके पूर्व ही म.प्र.शासन ने गठित सुधारन्यास को भंग कर दिया जिससे अधिग्रहण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकी। यह प्रक्रिया पूरी नहीं होने से न तो इस जमीन का कोई अवार्ड पारित किया गया और न ही किसी भूमिस्वामी को भुगतान हो सका। इस कारण से नगरपालिका को इस जमीन का भौतिक सत्यापन नहीं मिल सका और जमीन उसी भूमिस्वामी के पास रही। वर्ष 2006 में इस विवादग्रस्त जमीन पर नगरपालिका ने भूखंड बनाकर नीलाम कर दिया मगर उसकी रजिस्ट्री नहीं हो सकी। वर्तमान में नगरपालिका परिषद ने कुछ भूंखडों की रजिस्ट्री भी कर दी। यह प्रकरण प्रकाश में आने के बाद भूखंड स्वामी ने इस कार्यवाही को सुप्रीमकोर्ट में याचिका लगातार चुनौती दी। एडव्होकेट अरविंद जैन ने पत्रकारों को बताया कि उक्त जमीन हमारी और परिजनों की है उसका न तो अवार्ड पारित हुआ और न ही किसी ने मुआवजा लिया है। जमीन पर भूंखड बेचने या उस पर योजना को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दिया है।
वहीं दूसरी ओर विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि नगरपालिका ने लगभग 1 लाख 22 हजार रुपए का चेक अरविंद जैन नामक किसी व्यक्ति को देना बताया जा रहा है। जब भूंखड मालिक को इसका पता चला तो उन्होंने अपने स्तर पर जानकारी ली तो उन्हें पता चला कि यह राशि किसी अन्य अरविंद जैन को दी गई है जबकि वास्तविक भूमिस्वामी अरविंद जैन को आज दिनांक तक कोई राशि नहीं मिली है। नगरपालिका ने प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत इस जमीन का प्रस्ताव शासन को भी भेजा है। यदि यह जमीन नगरपालिका की नहीं है तो फिर नगरपालिका इस जमीन पर प्रधानमंत्री आवास कैसे बना पायेगी और यह योजना अधर में लटकी नजर आ रही है। इस संबंध में कार्यवाहक सीएमओ संजय दीक्षित का ध्यान जब इस ओर आकर्षित किया तो उन्होंने कहा कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश अभी हमें प्राप्त नहीं हुआ है जब आदेश प्राप्त होगा तब आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। स्मरण रहे कि लगभग 35 वर्ष पूर्व न्यास का गठन हुआ था और 1994 में नगर सुधार न्यास का असतित्व समाप्त कर दिया गया था और सारे स्टाफ का विलय नगरपालिका में कर दिया गया था। नगरसुधार द्वारा अधिग्रहित की गई इस भूमि का न तो नगर सुधार ने भौतिक सत्यापन प्राप्त किया था और न ही उस भूमि का कोई आवार्ड पारित हुआ। इस संबंध में वर्ष 2006 में भूमि धारक अरविंद जैन ने उच्च न्यायालय जबलपुर में पिटिसन लगाई थी। आदेश पारित होने के बाद उन्होंने 5 जुलाई 2017 को उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली में दायर की थी इस पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई में लेकर लीड ग्रांट करते हुए यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया है।
सुधार न्यास द्वारा अधिकृत की गई जमीन का न तो आवार्ड पारित हुआ न जमीन स्वामी को मुआवजा मिला और जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई
इटारसी। सुप्रीमकोर्ट ने एडव्होकेट दीपक जैन की एक याचिका को स्वीकार करते हुए विवादग्रस्त जमीन के प्रकरण में नगरपालिका को यथास्थिति बनाये रखने का आदेश जारी किया है। प्रकरण का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है कि इटारसी में 1981 में सुधार न्यास की स्थापना की गई थी। न्यास ने आवासीय कालोनी बनाने के लिए 55 एकड़ जमीन अधिकृत करना प्रस्तावित किया था। फेज-1 में आ रही जमीन को न्यास ने अधिकृत करने की पूर्ण प्रक्रिया की थी परंतु फेज-2 में एडव्होकेट अरविंद जैन सहित उनके परिजनों की लगभग साढ़े 5 एकड़ जमीन थी उसे वर्ष 1983 में भूखंड मालिक अरविंद जैन एडव्होकेट ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
यह जमीन अधिग्रहण की कार्यवाही होती इसके पूर्व ही म.प्र.शासन ने गठित सुधारन्यास को भंग कर दिया जिससे अधिग्रहण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकी। यह प्रक्रिया पूरी नहीं होने से न तो इस जमीन का कोई अवार्ड पारित किया गया और न ही किसी भूमिस्वामी को भुगतान हो सका। इस कारण से नगरपालिका को इस जमीन का भौतिक सत्यापन नहीं मिल सका और जमीन उसी भूमिस्वामी के पास रही। वर्ष 2006 में इस विवादग्रस्त जमीन पर नगरपालिका ने भूखंड बनाकर नीलाम कर दिया मगर उसकी रजिस्ट्री नहीं हो सकी। वर्तमान में नगरपालिका परिषद ने कुछ भूंखडों की रजिस्ट्री भी कर दी। यह प्रकरण प्रकाश में आने के बाद भूखंड स्वामी ने इस कार्यवाही को सुप्रीमकोर्ट में याचिका लगातार चुनौती दी। एडव्होकेट अरविंद जैन ने पत्रकारों को बताया कि उक्त जमीन हमारी और परिजनों की है उसका न तो अवार्ड पारित हुआ और न ही किसी ने मुआवजा लिया है। जमीन पर भूंखड बेचने या उस पर योजना को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दिया है।
वहीं दूसरी ओर विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि नगरपालिका ने लगभग 1 लाख 22 हजार रुपए का चेक अरविंद जैन नामक किसी व्यक्ति को देना बताया जा रहा है। जब भूंखड मालिक को इसका पता चला तो उन्होंने अपने स्तर पर जानकारी ली तो उन्हें पता चला कि यह राशि किसी अन्य अरविंद जैन को दी गई है जबकि वास्तविक भूमिस्वामी अरविंद जैन को आज दिनांक तक कोई राशि नहीं मिली है। नगरपालिका ने प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत इस जमीन का प्रस्ताव शासन को भी भेजा है। यदि यह जमीन नगरपालिका की नहीं है तो फिर नगरपालिका इस जमीन पर प्रधानमंत्री आवास कैसे बना पायेगी और यह योजना अधर में लटकी नजर आ रही है। इस संबंध में कार्यवाहक सीएमओ संजय दीक्षित का ध्यान जब इस ओर आकर्षित किया तो उन्होंने कहा कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश अभी हमें प्राप्त नहीं हुआ है जब आदेश प्राप्त होगा तब आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। स्मरण रहे कि लगभग 35 वर्ष पूर्व न्यास का गठन हुआ था और 1994 में नगर सुधार न्यास का असतित्व समाप्त कर दिया गया था और सारे स्टाफ का विलय नगरपालिका में कर दिया गया था। नगरसुधार द्वारा अधिग्रहित की गई इस भूमि का न तो नगर सुधार ने भौतिक सत्यापन प्राप्त किया था और न ही उस भूमि का कोई आवार्ड पारित हुआ। इस संबंध में वर्ष 2006 में भूमि धारक अरविंद जैन ने उच्च न्यायालय जबलपुर में पिटिसन लगाई थी। आदेश पारित होने के बाद उन्होंने 5 जुलाई 2017 को उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली में दायर की थी इस पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई में लेकर लीड ग्रांट करते हुए यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया है।







